धर्मरक्षक छत्रपती संभाजी महाराज

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Information In Hindi

महाराष्ट्र के महान राजा छत्रपती शिवाजी महाराज कि ही तहर शेर का कलेजा और एक महान राजा थे संभाजी महाराज. जन्मसे ही संभाजी महाराज यांनी शंभूराजे का संघर्ष शुरू हुवा जब उनके सर से अपनी माता कि छाया दूर हुई. शंभूराजे कि माता कि मृत्यू के बाद उनकी नानी और छत्रपती शिवाजी महाराज की माता जिजाबाई की निगरानी में शंभूराजे बड़े हुए. राजमाता जिजाबाईने उनकी परवरीश में कोई कमी नहीं रख्खी और उनको वो तालीम और संस्कार दिए जो उन्होंने कभी महाराज शिवाजी को दिए थे.
नाम
संभाजी
उपनाम
छवा और शम्भू जी राजे
जन्मदिन
14 मई 1657
जन्मस्थान
पुरन्दर के किले में
माता
सईबाई
पिता
छत्रपति शिवाजी
दादा
शाहजी भोसले
दादी
जीजाबाई
भाई
राजाराम
बहन
शकुबाई,अम्बिकाबाई,रणुबाई जाधव,दीपा बाई,कमलाबाई पलकर,राज्कुंवार्बाई शिरके
पत्नी
येसूबाई
मित्र और सलाहकार
कवि कौशल
कौशल
संस्कृत के ज्ञाता,कला प्रेमी और वीर योद्धा
युद्ध
1689 में वाई का युद्ध
शत्रु
औरंगजेब
मृत्यु
11 मार्च 1689
आराध्य देव
महादेव
मृत्यु का कारण
औरंगजेब की दी गयी यातना
विवाद
अपने परिवार में पिताजी शिवाजी से विवाद होने पर नजरबन्द किया और वहां से भाग निक्लौर मुगलों में जाकर शामिल हो गए और इस्लाम अपना लिया लेकिन मुगलों के अत्याचार को देखकर पुन: लौट आए.
पारिवारिक राजनीति का शिकार हुए.
उपलब्धि
औरंगजेब के सामने कभी घुटने नहीं टेके,अंतिम सांस तक योद्धा की भांति रहे
हिन्दुओं के जबरन मुसलमान बन जाने पर उनकी घर वापिसी और सम्मान लौटाने का कार्य सफलता पुर्वक किया

संभाजी महाराज : परिवार (Sambhaji : family)

संभाजी राजा वीर छत्रपति शिवाजी के पुत्र थे, संभाजी की माता का नाम सईबाई था. ये छत्रपति शिवाजी की दूसरी पत्नी थी. सम्भाजी राजे के परिवार में पिता शिवाजी और माता सईबाई के अलावा दादा शाहजी राजे, दादी जीजाबाई और  भाई-बहन थे. शिवाजी के 3 पत्नियां थी – साईंबाई,सोयरा बाई और पुतलाबाई.
साईबाई के पुत्र संभाजी राजे थे. सम्भाजी के एक भाई राजाराम छत्रपति भी थे, जो कि सोयराबाई के पुत्र थे. इसके अलावा संभाजी के शकुबाई, अम्बिकाबाई, रणुबाई जाधव, दीपा बाई, कमलाबाई पलकर, राज्कुंवार्बाई शिरके नाम की बहनें थी. सम्भाजी का विवाह येसूबाई से हुआ था और इनके पुत्र का नाम छत्रपति साहू था.

शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज (Shivaji Sambhaji Relation)

संभाजी महाराज का जीवन कठिनाईयो से भरा था और अनेको विषम परिस्थितियोंसे उन्हें जुजना पड़ा. विद्वानों के अनुसार महाराज सोयराबाई जो शुरवात में उन्हें अपने सगे बेटे की तरह प्यार करती थी, सत्ता की लालसाके कारन और अपने पुत्र को राजा बनाने हेतु उनसे इर्षा रखने लगी थी.
सोयराबाई की इर्षा के चलते शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज के बिच रिश्ते खींचने लगे. संभाजी महाराज एक महान योद्धा थे, उन्होंने अपने पिता को अपनी वीरता के कई प्रमाण दिए. पर अब सत्ता के लिए षड्यंत्र शुरू हो चुके थे.

संभाजी महाराज की उपलब्धियां (Achievements of sambhaji)

संभाजी महाराज ने अपने छोटे से जीवन काल में हिन्दू समाज के हित में बहुत बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल की थी. जिसके प्रत्येक हिन्दू आभारी हैं. उन्होंने औरंगजेब की 8 लाख की सेना का सामना किया और कई युद्धों में मुघलो को पराजित भी किया. औरंगजेब जब महाराष्ट्र में युद्धों में व्यस्त था, तब उत्तर भारत में हिन्दू शासकों को अपना राज्य पुन: प्राप्त करने और शांति स्थापित करने के लिए काफी समय मिल गया. इस कारण ही वीर मराठाओ के लिए सिर्फ दक्षिण ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के हिन्दू उनके ऋणी हैं. क्यूंकि उस समय यदि संभाजी औरंगजेब के सामने समर्पण कर लेते या कोई संधि कर लेते, तो औरगंजेब अगले 2-3 वर्षों में उत्तर भारत के राज्यों को वापिस हासिल कर लेता,और वहां की आम प्रजा और राजाओं की समस्या बढ़ जाती है,यह संभाजी के सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा सकता हैं. हालांकि सिर्फ संभाजी ही नहीं अन्य राजाओं के कारण भी औरगंजेब दक्षिण में 27 सालों तक विभिन्न लड़ाईयों में उलझा रहा, जिसके कारण उत्तर में बुंदेलखंड,पंजाब और राजस्थान में हिन्दू राज्यों में हिंदुत्व को सुरक्षित रखा जा सका.

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Information In Hindi

संभाजी ने कई वर्षों तक मुगलों को महाराष्ट्र में उलझाए रखा. देश के पश्चिमी घाट पर मराठा सैनिक और मुगल कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था.संभाजी वास्तव में सिर्फ बाहरी आक्रामको से हीं नहीं बल्कि अपने राज्य के भीतर भी अपने दुश्मनों से गिरे हुए थे. इन दोनों मोर्चों पर मिलने वाली छोटी छोटी सफलताओं के कारण ही संभाजी प्रजा के एक बड़े वर्ग के दिलों में अपनी जगह बना पा रहे थे.
वो समय कुछ ऐसा था कि लगातार कई समय तक पहाड़ और धरती वीर मराठो और मुगलों के खून से सनी रहती थी. फिर एक समय ऐसा आया जब सभी मराठा पहाड़ी से नीचे आ गए और इस तरह से मुगलों और मराठो के सेनापति अपनी सेनाओं के साथ आमने-सामने हो गए.लेकिन ये किसी मैदान में आमने-सामने होने जैसी स्थिति नहीं थी. इसमें मराठाओं का स्थान पहाड़ के निचले हिस्से से लेकर छोटी तक था, जबकि पहाड़ो के पास के मैदानों में मुघल सैनिको ने अपना डेरा जमा रखा था. ऐसे में लगभग 7 वर्षों तक आघात और प्रतिघात का क्रम चला. जिसमे मुगलों द्वारा गढ़ को जीतना और मराठाओ द्वारा वापिस हासिल करना लगातार कठिन हो रहा था. हालत ये थे कि उत्तर भारत में कुछ राज्य सोचने लगे थे कि औरंगजेब कभी लौटकर दिल्ली नहीं आएगा और अंतत: हिंदुत्व के साथ जंग में हार जायेगा. इस बीच संभाजी ने 1682 में औरंगजेब के पुत्र अकबर को शरण देने की पेशकश भी की, जिसे राजपूत राजाओं ने बचा लिया.

धर्मरक्षक संभाजी :- धर्म के लिये आहुती (Sambhaji’s Death)

नेताजी पालकरसे शुरू हुवा शुद्धीकरण; यांनी जिन्हे जबरण धर्मान्तरित किया गया हे उन्हें उनकी इच्छासे फिरसे वापस धर्ममें लेने की प्रथा संभाजीने न सिर्फ जारी रखी बल्कि इसकी व्यापकता बधाई. शिवाजी महाराज के कार्यकालमें बड़े व्यक्ति, सरदार इस वापस हिन्दू धर्म में लौटे थे. पर एक साधारण धर्मांतरीत अभी भी इससे अछूत था. संभाजी महाराज महादेव के बडे भक्त थे.
अपने पिता के इस महान कार्य को संभाजी महाराज ने आगे बढाया. इस बारे में एक कहानी प्रचलित हे. महाराष्ट्र के एक गांव के कुलकर्णी को जबरन मुसलमान बनाया गया था. कुलकर्णी फिरसे हिन्दू धर्ममें आना चाहता था, पर सनातनी ब्राह्मण विरोध में खड़े थे. तब संभाजी महाराजने इसमें दखल दी और कुलकर्णी का शुद्धिकरण करवाया
औरंगजेब जो धर्मांध था, और संभाजी महाराज के महान कार्योने उसकी नफ़रत बढ़ा दी थी. ९ लाख की सेना ४ लाखसे भी ज्यादा हाथी और घोड़ो के साथ वो दख्खन में आया. 1989 आते आते इस सेना में काफी बढ़त भी हुए और सेकड़ो मराठा सरदार भी हिन्दवी स्वराज्यसे द्रोह करकर मुघलोसे जुड़ गए थे.
एकदिन संगमेश्वर में मुकर्रब खानने छापा डालकर छत्रपति संभाजी महाराज को बंदी बनाया था. इतिहासकारों के अनुसार महाराज के करीबी रिश्तेदारने उन्हें पकड़वा दिया था. अगले 5 दिन तक चलने के बाद संभाजी महाराज को औरंगजेब के सम्मुख ले जाया गया.
औरंगजेब ने जब संभाजी को देखा तो वो सिंहासनसे निचे उतारकर आया और उसने अल्लाह को याद करने के लिए अपने घुटने टेके. कवी कलश जो संभाजी महाराज के साथ बंधे हुए थे उन्होंने कहा “राजे ! देखिये, खुद अलमगीर आपके आगे नतमस्तक हुवा हे”. कवी कलश ने उस विपरीत स्थितिमेभी वीरता दिखाई थी.
मुग़ल सरदारों ने संभाजी को सलाह दी को वो, औरंगजेब को अपना पूरा राज्य सौप दे और आलमगीरसे क्षमा मांग ले. संभाजी महाराज ने इस बातसे साफ़ मना कर दिया. तब खुद औरंगजेबने संभाजी महाराज को सन्देश भेजा की अगर वो इस्लाम को अपनाये तो वो उसे बक्श देगा और दुनियाभर के ऐशो-आराम में जिंदगी बिताएगा.
पर संभाजी महाराज ने साफ़ शब्दों में मना कर दिया. बौखलाकर औरंगजेबने उन्हें यातनाये देना शुर कर दिया. उनके हाथो को झुनझुना बांधकर उन्हें ऊँटोसे बाँध दिया. पुरे तुलापुर में संभाजी महाराज और कवी कलश का जुलुस निकला गया. झुनझुनो के आवाज साफ़ सुनाई डे इसकारण इस महान राजा को तुलापुर के रास्तो पर घसीटा गया. हर यातना के साथ उन्हें इस्लाम अपनाने के लिए कहा जाता था.

संभाजी महाराज द्धारा लिखी गईं रचनाएं – Sambhaji Maharaj Book

संभाजी महाराज एक कुशल और बहादुर शासक होने के साथ-साथ साहित्य और संस्कृत भाषा के अच्छे जानकार भी थे। कवि कलश से मुलाकात के बाद उनकी रुचि साहित्य की तरफ बढ़ने लगी थी।

यही नहीं संभाजी महाराज ने अपने पिता शिवाजी महाराज के सम्मान में संस्कृत में बुधचरित्र भी लिखा था। इसके अलावा संभाजी महाराज ने नखशिखांत, नायिकाभेद, बुधभूषणम, श्रृंगारिका, सातशातक समेत कई संस्कृत ग्रंथ लिखे थे।

संभाजी की मृत्यु (Sambhaji Maharaj Death)

औरंगजेब ने कई बार कहा कि वो संभाजी को क्षमा कर देगा, लेकिन वो यदि अब भी इस्लाम कबूल ले.  संभाजी ने मुगलों का उपहास उड़ाते हुए कहा, कि वह मुस्लिमों के समान मुर्ख नहीं है, जो ऐसे मानसिक विक्षिप्त व्यक्ति (मोहम्मद) के सामने घुटने टेके. फिर संभाजी ने अपने हिन्दू आराध्य महादेव को याद किया और कहा कि धर्म-अधर्म के भेद को देखने और समझने के बाद  वो अपना जीवन हज़ारो बार हिंदुत्व और राष्ट्र को समर्पित करने को तैयार हैं. और इस तरह संभाजी म्लेच्छ औरंगजेब के आगे नहीं झुके, इससे पहले तक किसी ने भी अल्लाह, मोहम्मद, इस्लाम के खिलाफ खुलकर इतना कुछ नहीं बोला था. औरंगजेब ने इससे क्रोधित होकर आदेश दिया, की संभाजी के घावों पर नमक छिड़का जाए. और उन्हें घसीटकर औरंगजेब के सिंहासन के नीचे लाया जाए. फिर भी संभाजी लगातार भगवान् शिव का नाम जपे चले जा रहे थे. फिर उनकी जीभ काट दी गई और आलमगीर के पैरो में राखी गयी, जिसने इसे कुत्तो को खिलाने का आदेश दे दिया. लेकिन औरंगजेब भूल गया था, कि वो जीभ काटकर भी संभाजी के दिल और दिमाग से कभी देशभक्ति और भगवद भक्ति को अलग नहीं कर सकता.
संभाजी अब भी मुस्कुराते हुए भगवान् शिव की आरधना कर रहे थे और मुगलों की तरफ गर्व भरी दृष्टि से देख रहे थे. इस पर उनकी आँखे निकाल दी गयी और फिर उनके दोनों हाथ भी एक-एक कर काट दिए गए.और ये सब धीरे-धीरे हर दिन  संभाजी को प्रताड़ित करने के लिए किया जाने लगा. संभाजी के दिमाग में तब भी अपने पिताजी वीर शिवाजी की यादें ही थी, जो उन्हें प्रतिक्षण इन विपरीत परिस्थिति का सामना करने के लिए प्रेरित कर रही थी. हाथ काटने के भी लगभग 2 सप्ताह के बाद 11 मार्च 1689 को उनका सर भी धड से अलग किया गया. उनका कटा हुआ सर महाराष्ट्र के कस्बों में जनता के सामने  चौराहों पर रखा गया, जिससे की मराठाओं में मुगलों का भी व्याप्त हो सके. जबकि उनके शरीर को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर तुलापुर के कुत्तों को खिलाया गया. लेकिन ये सब वीर मराठा पर अपना प्रभाव नहीं जमा सके. अंतिम क्षणों तक भगवान शिव का जाप करने वाले बहादुर राजा के इस बलिदान से हिन्दू मराठाओ में अपने राजा के प्रति सम्मान  मुगलों के प्रति आक्रोश और बढ़ गया. एक अन्य किवंदती के अनुसार संभाजी का वध “वाघ नाखले” मतलब चीते के नाखुनो से किया गया था,उन्हें दो हिस्सों में चीरकर फाड़ा गया था और कुल्हाड़ी से सर काटकर पुणे के पास तुलापुर में भीमा नदी के किनारे पर फैका गया था.

Powada (Sambhuji) Sambhaji Maharaj

देश धरम पर मिटने वाला। शेर शिवा का छावा था ।।
महापराक्रमी परम प्रतापी। एक ही शंभू राजा था ।।
तेज:पुंज तेजस्वी आँखें। निकलगयीं पर झुकी नहीं ।।
दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति का। दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं ।।
दोनो पैर कटे शंभू के। ध्येय मार्ग से हटा नहीं ।।
हाथ कटे तो क्या हुआ?। सत्कर्म कभी छुटा नहीं ।।
जिव्हा कटी, खून बहाया। धरम का सौदा किया नहीं ।।
शिवाजी का बेटा था वह। गलत राह पर चला नहीं ।।
वर्ष तीन सौ बीत गये अब। शंभू के बलिदान को ।।
कौन जीता, कौन हारा। पूछ लो संसार को ।।
कोटि कोटि कंठो में तेरा। आज जयजयकार है ।।
अमर शंभू तू अमर हो गया। तेरी जयजयकार है ।।
मातृभूमि के चरण कमलपर। जीवन पुष्प चढाया था ।।
है दुजा दुनिया में कोई। जैसा शंभू राजा था? ।।
~ शाहीर योगेश
छत्रपती संभाजी महाराज की जय

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